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कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के मंत्रिपरिषद से अचानक इस्तीफा देने के पीछे की कहानी चंद मिनटों की नहीं

उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के मंत्रिपरिषद से अचानक इस्तीफा देने के पीछे की कहानी चंद मिनटों की नहीं है। जानकारों का मानना है इस्तीफा देने की पटकथा में तब लिखी गई थी जब समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर ओमप्रकाश राजभर एक जाति विशेष समुदाय की राजनीति को हवा देने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन कर चुके थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा उसी वक्त आम हो गई थी कि आज नहीं तो कल स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कुछ अन्य अति पिछड़े नेता भाजपा का दामन छोड़ ही देंगे। दरअसल मंत्रिमंडल में स्वामी प्रसाद मौर्य और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच अति पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता होने का अंदरूनी द्वंद शुरुआत से ही चलता रहा है।
उत्तर प्रदेश में राजनीति के जानकार बताते हैं कि कभी प्रदेश में कभी बहुजन समाज पार्टी में अति और पिछड़ों के सबसे बड़े नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के वर्चस्व को तोड़ने के लिए भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य पर दांव लगाकर उन्हें पिछड़ों के बड़े नेता के तौर पर तैयार किया था। यह संयोग ही था कि 2017 में जब भाजपा की सरकार बनी तो दोनों “मौर्य नेता” एक ही पार्टी में आकर मंत्रिपरिषद में शामिल हुए। केशव प्रसाद मौर्य (केपीएम) और स्वामी प्रसाद मौर्य (एसपीएम) में वर्चस्व की लड़ाई तो तभी से शुरू हो गई थी लेकिन यह बात अलग है कि जैसे तैसे स्वामी प्रसाद मौर्य खुद को भाजपा में एडजस्ट करते रहे। इस बात का खुलासा तो खुद स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद किया।

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