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Exclusive : बॉलीवुड की ‘बग्स बनी’ इलियाना बोलीं- ‘सेट पर खुद को निर्देशक के हवाले कर देती हूं’

नौ साल हो गए साउथ की सुपरस्टार इलियाना डिक्रूज को हिंदी सिनेमा में कदम रखे हुए। उनकी हर फिल्म को देख लोगों को अब भी उनकी डेब्यू फिल्म ‘बर्फी’ की श्रुति याद आ ही जाती है। कहां तक पहुंची है हिंदी सिनेमा में उनकी कामयाबी की डोर? 

किसी पत्रकार से बातें करना और कैमरे के सामने खुद पत्रकार होने का अभिनय करना, दोनों के लिए कैसे तैयारी करती हैं?

ये तो आप मुझे बताइएगा मेरी नई फिल्म ‘द बिग बुल’ देखकर। पत्रकारों से बातें करना तो मुझे खूब भाता है और इसके लिए मुझे कभी कोई तैयारी करने की जरूरत नहीं होती। हां, पत्रकार बनने का जब नंबर आया तो पहले तो मुझे लगा कि मुझे किसी मशहूर पत्रकार का संदर्भ लेना चाहिए या किसी की चाल ढाल देखनी चाहिए। लेकिन, जब मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी तो मुझे लगा कि ये किरदार इतना शानदार तरीके से लिखा हुआ है कि अगर मैंने किसी दूसरे शख्स का संदर्भ लेने की कोशिश तो मैं इसे खराब कर सकती हूं। इसलिए मैंने सिर्फ स्क्रिप्ट पर अपना ध्यान फोकस किया। उसी के हिसाब से खुद को ढाला। हां, ये किरदार चुनौती भरा जरूर रहा।

तो आप सेट पर जब होती हैं तो खुद को पूरी तरह से निर्देशक के प्रति समर्पित कर देती हैं, या आपका अपना भी योगदान होता है?

किसी भी किरदार को करने के लिए मैं चाहती तो यही हूं कि मैं पूरी तरह से निर्देशक की कलाकार बनूं। ऐसा इसलिए क्योंकि किरदार को सोचने और उसकी परदे पर कल्पना उन्होंने ही रची है। ऐसा करने से किरदार के साथ कुछ ऊंच नीच होने का डर भी नहीं होता। लेकिन, हां, बतौर कलाकार मैं भी अपने सुझाव देती रहती हूं। किसी किरदार को देखने का, उसे जीने का कलाकार का अपना भी नजरिया होता है, लेकिन निर्देशक की स्क्रिप्ट जानदार हो तो मैं उसी के अनुसार जाना पसंद करती हूं।

लेकिन, फिल्म ‘बर्फी’ में तो आपको स्क्रिप्ट मिली ही नहीं होगी क्योंकि निर्देशक अनुराग बसु स्क्रिप्ट देते नहीं हैं किसी कलाकार को?

हां, सही कहा आपने। उस फिल्म में तो मुझे पता ही नहीं चलता था कि हो क्या रहा है? मैं जो भी शूट कर रही हूं वह कहानी में कहां है, फिल्म में किस सीन से पहले या किस सीन के बाद आएगा, मुझे कुछ नहीं पता होता था। अनुराग बसु की फिल्ममेकिंग ही ऐसी है। हालांकि अच्छा ही था कि हमारे पास स्क्रिप्ट नहीं थी। क्योंकि स्क्रिप्ट होती और फिर कुछ बदलाव होता तो मैं बहुत भ्रमित हो जाती। वहां भी मैंने खुद को पूरी तरह निर्देशक के हवाले कर दिया था।

और, इस किरदार से लंबी लकीर खींचना आपको अब भी शेष है?
ये अब मुझे भी समझ आ रहा है। शायद मैंने ही कभी खुद को अपनी सीमाओं से बाहर नहीं बहने दिया। मुझे पता है कि मैं जो कुछ भी कैमरे के सामने कर सकती हूं, उसका आधा भी मैं दर्शकों के सामने पेश नहीं कर पा रही हूं।

इसके लिए आपने हिंदी सिनेमा के दिग्गज मसलन संजय लीला भंसाली या आशुतोष गोवारिकर या अन्य निर्देशकों से काम नहीं मांगा कभी?
हां, ये गलती मुझसे मेरे करियर में हुई है। मैं मुंबई में लोगों से ज्यादा मिली नहीं। मुझे लोगों से मिलने जाना चाहिए था। काम मांगना चाहिए था। मैं शायद इस मामले में थोड़ा आलस कर गई। आपने अच्छा मुझे सचेत किया है, इस बात के लिए। मैं अब निर्देशकों से काम मांगने जरूर जाऊंगी।

हां, ‘कृष 4’ के लिए तो राकेश रोशन के पास आपको जरूर जाना चाहिए, जिन्हें आप अपने पहले विज्ञापन के दिनों से जानती हैं?

(हंसते हुए) अरे वह तो कब की बात हो गई। आपने सही याद दिलाया कि राकेश रोशन के साथ मैंने अपने पहले विज्ञापन में काम किया है। वह परदे पर उस कमर्शियल में मुझे ब्रेक देने की बात करते हैं। देखिए ना समय कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता। मैंने पढ़ाई के दिनों में मॉडलिंग शुरू ही की थी और मुझे वह विज्ञापन मिल गया था। उनसे संपर्क स्थापित करने की मैं पूरी कोशिश करूंगी।

दक्षिण के नामचीन निर्देशक पुरी जगन्नाथ के साथ आपने तीन फिल्मे की हैं। वह पूरी तरह से कमर्शियल सिनेमा के निर्देशक हैं, उनके साथ काम करना कैसा रहा?

पुरी बहुत ही सुलझे हुए निर्देशक हैं। वह जो कुछ करते हैं, इतनी सहजता से करते हैं कि कई बार स्क्रिप्ट में ऐन मौके पर किया बदलाव भी कलाकार को पता नहीं चलता। उनके काम करने का तरीका मुझे बहुत पसंद है और मेरी उनसे ट्यूनिंग भी खूब अच्छी रही। वैसे तो मैं खुद को ‘डायरेक्टर्स एक्टर’ मानती हूं लेकिन पुरी मेरे लिए ‘एक्टर्स डायरेक्टर’ हैं।

अजय देवगन के साथ ‘रेड’, ‘बादशाहो’ के बाद ‘द बिग बुल’ भी आपकी हैट्रिक है, कैसे इंसान हैं वह और कोई एक ऐसी चीज जिसने आपको बहुत प्रभावित किया हो?

अजय देवगन बहुत ही मददगार इंसान हैं। वह आसपास होते हैं तो चीजें बहुत सुकून से होती जाती हैं। वह जितने अच्छे कलाकार हैं, उतने ही अच्छे निर्माता। मुझे याद है हम राजस्थान में ‘बादशाहो’ की शूटिंग कर रहे थे तो मैंने उनसे पूछा था कि आप सबकुछ इतनी आसानी से कैसे कर लेते हो? तो उनका कहना था कि वह एक आलसी अभिनेता हैं। हालांकि, ये मजाक में कही गई बात है लेकिन मुझे उनके हमेशा शांत रहने वाले व्यवहार ने बहुत प्रभावित किया है।

‘फेयर एंड लवली’ से अब ‘अनफेयर लवली’ तक आप आ चुकी हैं। इस सफर के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

फिल्म ‘अनफेयर लवली’ की शूटिंग हमने खत्म कर ली है और मैं ये कह सकती हूं कि ये एक बहुत ही कमाल की फिल्म है। आज के समय के हिसाब से बनी ये फिल्म है। काया का करिश्मा क्या होता है और अच्छे दिल की दौलत क्या होती है, ये फिल्म इसी का फर्क समझाती है। मुझे पक्का भरोसा है कि इस दौर में जिस तरह का कथानक आधारित सिनेमा लोगों को पसंद आ रहा है, उसमें फिल्म ‘अनफेयर लवली’ बहुत सारी ऐसी बातें कहने वाली हैं जिन पर हम बात ही नहीं करते।

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